Monday, March 31, 2014

Story on proverb- Parhit saris dharm nahi bhaai/ परहित सरिस धर्म नहिं भाई


मैं वैली स्कूल में आई. सी. एस. ई  में भी हिंदी पढ़ाती हूँ । इस बोर्ड के हिंदी पेपर में कहावत के ऊपर एक निबंध पूछा जाता है । बच्चों से कई सारी  कहावतों पर निबंध लिखाना मुश्किल है इसलिए हर छात्र-छात्रा को अलग-अलग कहावत दी जाती है जिस पर वे निबंध लिखते हैं और फिर कक्षा में सब छात्र-छात्राएँ अपने लिखे निबंध पढ़ते हैं जिससे सबको कहावतें भी समझ आ जाएँ और परीक्षा में उन्हें कोई मुश्किल न हो । इन कहावतों पर लिखे निबंधों को छात्र-छात्रों को सुनाया जा सकता है या उन्हें पढ़ने के लिए दिया जा सकता है जिससे उन्हें कहावतों का अर्थ अच्छी तरह से समझ आ सके । हर कहावत के आगे वर्ष लिखा गया है , इसका मतलब है कि यह कहावत बोर्ड में उस वर्ष में पूछी गई है । आशा है कि यह सामग्री अध्यापकों और अध्यापिकाओं के साथ-साथ छात्र-छात्राओं के लिए भी उपयोगी होगी । 

परहित सरिस धर्म नहिं भाई  (अनुका) 2002
"परहित सरिस धर्म नहिं भाई" का अर्थ है कि दूसरों की सहायता करने से बड़ा और कोई धर्म नहीं । ऊँच-नीच, रंग-भाषा इत्यादि में अंतर न मानकर यदि हम अपना जीवन परहित या जनता की सेवा में लगा दें तो कोई पीड़ित नहीं रहेगा । महात्मा गाँधी तथा मदर टेरेसा जैसी महान आत्माओं ने अपना संपूर्ण जीवन परहित व परोपकार में ही लगा दिया था ।
जब मैं यह कहावत सुनती हूँ तो मुझे नवम्बर २६ की याद आ जाती है । एक किश्ती में आतंकवादी मुम्बई शहर आ पहुँचे । मुम्बई के मशहूर विक्टोरिया टर्मिनल में अपनी बन्दूकों के साथ गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं । बच्चों व औरतों को भी नहीं छोड़ा । उस समय स्टेशन पर श्री विष्णु भोण्डे लाऊड स्पीकर पर गाड़ियों व प्लेटफार्म नम्बरों की घोषणा कर रहे थे । जब उन्हें पता चला कि रेलयात्रियों को गोलियों का शिकार बनाया जा रहा है । उन्होंने अपने-आप बिना किसी अफसर के आदेश पर घोषणा का रुख बदल दिया । उन्होंने सभी यात्रियों को पीछे के रास्ते से स्टेशन से निकल जाने का सुझाव दिया । इस तरह न जाने कितने हज़ारों लोगों की जानें बच गईं । उनके स्थान पर कोई और होता तो अपनी जान बचाने के लिए भाग जाता ।
सिलसिला कुछ और गंभीर हुआ । वे आतंकवादी ताजमहल होटल गए । विश्व के बहुत मशहूर लोग हर समय वहाँ उपस्थित होते हैं । वहाँ भी आतंकवादियों ने गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं । होटल के मैनेजर श्री करणबीर सिंह काँग, चुपके से पिछले दरवाजे द्वारा लोगों को बाहर निकालने में मदद करने लगे । हश्र यह हुआ कि आतंकवादियों ने होटल में आग लगा दी । श्री काँग का परिवार जो होटल में ही रहता था, इस दुर्घटना का शिकार हो गया ।
यह घटना भगवद्गीता का जीता-जागता उदाहरण मान सकते हैं । इस पवित्र ग्रंथ के अनुसार, हमें बिना फल की इच्छा किए अपना कर्त्तव्य निभाना चाहिए । यदि परोपकार को कर्त्तव्य माना जाए, तो इससे बड़ा धर्म भला और क्या हो सकता है ?
सकल प्रकृति परोपकार के उदाहरणों से भरपूर है । वृक्ष अपने फल जीव-जन्तुओं को बाँटने में नहीं हिचकिचाते । चन्दन का पेड़ कटने पर भी अपनी सुगन्धि हमें भेंट में देता है। झरने व नदियाँ स्वच्छ पानी स्वयं नहीं पीते। गाय व बकरी हमें अपना दूध देती हैं ।
विश्व के सभी महत्त्वपूर्ण धर्म सुकर्म व सेवा के भाव पर आधारित हैं । किसी ने सही कहा है-" कर भला तो हो भला, अन्त भले का भला ।" लेकिन फिर भी हर मज़हब के लोग दूसरों से नफरत क्यों करते हैं ? भारत में हिन्दू-मुसलिम भाई-भाई बनकर रह सकते हैं तो फिर इज़रायल में हर समय लड़ाई क्यों? यदि घृणा की भावना प्रेम में बदल जाए तो दुनिया में सदैव सुख, शाँति विराजमान दिखेगी ।यदि हम मन्दिर, मसजिद, गिरजाघर या गुरुद्वारे न जाएँ और पूजा-पाठ आदि में भाग न लें , हमेशा दूसरे के लिए अपना समय व कर्म प्रदान करें तो हमेशा के लिए बुराई का नाश हो सकता है ।
अनपढ़ को पढ़ाकर, अपंग को आत्मविश्वास दिलाकर, बूढ़ों को संगति देकर, बीमार को रोग पर विजय पाने के लिए क्षमता देकर - हम सब अनगिनत तरीकों से दूसरों की मदद कर सकते हैं । चोरी, चुगली न करना, दूसरों को पीड़ा या कष्ट न देना भी ज़रूरी है । पुराने ज़माने की हिन्दी फिल्म का मशहूर गीत हमें आज भी यह सीख देता है-
"जीना तो है उसी का, जिसने यह राज़ जाना ।
 है काम आदमी का, औरों के काम आना ॥"
निष्कर्षस्वरूप, हर मानव को अन्य का भला करते समय ज़रा भी हिचकिचाना नहीं चाहिए बल्कि दूसरों का भला करना हरेक को अपना धर्म समझना चाहिए ।

परहित सरिस धर्म नहीं भाई (रयान)
मेरा नाम रयान है , मैं टाइम्स इण्डिया के अखबार के दफ्तर में काम करता हूँ । आज हमारे भारत को एक बहुत दु:ख भरी कहानी सुनाना चाहता हूँ ।
तीन दिन पहले की बात है । इण्डोनेशिया में एक होटल था । उस होटल का मैनेजर एक बहुत अच्छा आदमी था । वह ईमानदारी से काम करता था और अपने दिन की दाल-रोट कमा लेता था । उसकी बीवी और दो बच्चे समुद्र के किनारे एक छोटे-से घर में रहते थे । वे सब उनके पास जो भी था, उससे बहुत खुश थे । वह होटल जहाँ यह आदमी अथवा मैनेजर जे.जे. जोकोबो काम कर रहा था, वह होटल भी सुमद्र के किनारे पर था लेकिन जोकोबो के घर से काफी दूर था ।
अचानक २६ दिसम्बर को अथवा तीन दिन पहले इण्डोनेशिया में एक बहुत बड़ी दुर्घटना हुई । वहाँ सुनामी आई । सुनामी आने की बात सुनकर जोकोबो ने होटल के सब लोगों अथवा ग्राहकों को बाहर किसी सुरक्षित जगह भेज दिया । उसने एक पल के लिए भी अपने परिवार के बारे में नहीं सोचा । उसी क्षण पचास फुट की ऊँचाई की लहरें आईं और सारे रास्तों को नष्ट कर दिया । पाँच घंटों तक प्रकृति की यह लीला सबने देखी । पाँच घण्टे बाद जब पानी वापिस समुद्र में जा रहा था तो जोकोबो अपने परिवार की खोज में निकला । वह अपने घर की तरफ जाने लगा और जब वहाँ पहुँचा तो देखा कि उसका घर था ही नहीं, वह यह देखकर रो पड़ा । उसे थोड़ा भी समय नहीं लगा था यह समझने के लिए कि उसका परिवार खत्म हो चुका था । लेकिन जब कई न्यूज़ रिपोर्टरस ने उसे पूछा कि वह कैसा महसूस कर रहा है तो उसने कहा," मैं दु:खी हूँ कि मेरा पूरा परिवार अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन मैं फिर भी खुश हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैंने बहुत लोगों की ज़िन्दगी बचाई है । अगर मैं अपने परिवार को बचाने जाता तो सैंकड़ों लोग खत्म हो जाते । इसलिए मैं सब व्यक्तियों को कहता हूँ कि वही करो, जो दूसरों का भला करे ।

जोकोबो ने आज हम सब को बहुत कीमती बात बताई और करके भी दिखाई कि "परहित सरिस धर्म नहिं भाई!"








2 comments:

  1. PAROPKAR KAR
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
    V
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
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    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईंजाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
    जाको राखे साईंया मार सके ना कोईं
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